What is foreign currency reserves, क्या है विदेशी मुद्रा भंडार, क्या हैं इसके मायने ?

Foreign currency reserve kya hai

Foreign currency reserve kya hai:- किसी भी देश के इकॉनमी के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का होना बहुत ही जरुरी है। इस लेख में हम नजर डालने वाले है क्या होता है विदेशी मुद्रा भंडार, क्या हैं इसके मायने ? और इससे संबधित महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में… किसी भी देश के इकॉनमी के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का होना बहुत ही जरुरी है। ऐसा माना जाता है कि जिसे देश की विदेशी मुद्रा भंडार ज्यादा होगा उस देश के लिए अच्छा रहेगा। विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा रखी गई धनराशि या अन्य परिसंपत्तियां हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वह अपनी देनदारियों का भुगतान कर सकें। इस तरह की मुद्राएं केंद्रीय बैंक जारी करता है।

दरअसल 1990 में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री के सात महीने के शासन काल में देश की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। तब भारत की इकॉनमी भुगतान संकट में फंसी हुई थी। इसी समय रिजर्व बैंक ने 47 टन सोना गिरवी रख कर कर्ज लेने का फैसला किया। उस समय के गंभीर हालात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार 1.1 अरब डॉलर ही रह गया था। भारत की मुद्रा रुपया है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए ज़्यादा डॉलर का होना बहुत ज़रूरी है। वर्ल्ड इकॉनमी में किस देश की आर्थिक सेहत सबसे मज़बूत है, इसका निर्धारण इससे भी होता है कि उस देश का विदेशी मुद्रा भंडार कितना भरा हुआ है।

What is Foreign currency reserve/Foreign currency reserve kya hai ?

विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा रखी गई विदेशी मुद्रा या अन्य परिसंपत्तियां हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा (foreign exchange), गोल्ड रिजर्व( Gold reserve, एसडीआर और आईएमएफ कोटा डिपाजिट(), ट्रेज़री बिल (Treasury bills), बॉन्ड और अन्य सरकारी प्रतिभूतियों () शामिल होतीं हैं। जरूरत पड़ने पर इस भंडार से देनदारियों का भुगतान किया जाता है। विदेशी मुद्रा भंडार को फॉरेक्स रिजर्व भी कहा जाता है।   RBI (Reserve Bank Of India) भारत में विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक है।

दुनिया भर के विदेशी मुद्रा भंडार में प्रभुत्व डॉलर का ही यानि डॉलर सबसे उपर है। आप बाज़ार जाते हैं तो जेब में रुपए लेकर जाते हैं। इसी तरह भारत को किसी अन्य देश से तेल ख़रीदना होता है तो वहां रुपए नहीं डॉलर देने होते हैं। जैसे उदाहरण को तौर पर समझे तो भारत ने फ़्रांस से रफ़ाल लड़ाकू विमान ख़रीदा तो भुगतान डॉलर में करना पड़ा न कि रुपए में। मतलब रुपया राष्ट्रीय मुद्रा है, लेकिन भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए डॉलर की शरण में ही जाना पड़ता है।

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मतलब अर्थव्यवस्था और देश को मज़बूत रखने के लिए बहुत ज़्यादा डॉलर का होना ज़रूरी है। डॉलर आएंगे कहां से? डॉलर निर्यात से आते हैं। जैसे भारत कोई सामान दूसरे देश से ख़रीदता है तो डॉलर में भुगतान करता है, वैसे ही जब कोई सामान बेचता है तो डॉलर में भुगतान लेता है। इसका सीधा है कि मतलब भारत के पास कितना डॉलर होगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि भारत दुनिया भर में क्या-क्या बेचता है।

इकोनॉमी के लिए क्यों जरूरी है फॉरेक्स रिजर्व?

देश की इकॉनमी में विदेशी मुद्रा भंडार का अहम योगदान होता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर नवंबर 1990 में सात महीनों के शासन काल में देश की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। तब भारत की इकॉनमी भुगतान संकट में फंसी हुई थी। इसी समय रिजर्व बैंक ने 47 टन सोना गिरवी रख कर कर्ज लेने का फैसला किया। उस समय के गंभीर हालात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार 1.1 अरब डॉलर ही रह गया था। हालात यह हो गई थी कि इतनी रकम तीन हफ्तों के आयात के लिए पर्याप्त नहीं थी।

किसी भी वस्तु या सेवा की क़ीमत उसकी मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। अगर रुपए की मांग कम है तो उसकी क़ीमत भी कम होगी और डॉलर की मांग ज़्यादा है, लेकिन उसकी आपूर्ति कम है तो उसकी क़ीमत ज़्यादा होगी। आपूर्ति तब ही पर्याप्त होगी जब उस देश का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त होगा।

रुपया जब कमज़ोर होता है तो आयात बिल बढ़ जाता है। रुपया कमज़ोर होने का मतलब यह है कि डॉलर मज़बूत हुआ है। इस आप ऐसे समझ सकते है कि यानी एक आईफ़ोन की क़ीमत एक हज़ार डॉलर है और एक डॉलर की क़ीमत 74 रुपए हो गई है तो आपको 74 हज़ार रुपए देने होंगे। अगर एक डॉलर की क़ीमत 45 रुपए होती तो कम पैसे देने होते। मतलब आप केवल आईफ़ोन ही नहीं ख़रीद रहे हैं बल्कि डॉलर भी ख़रीद रहे हैं। रुपए की कमज़ोरी के कारण भारत का तेल आयात बिल भी बढ़ गया है।

विदेशी मुद्रा भंडार का अर्थव्यवस्था के लिए महत्व

  • विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी सरकार और आरबीआई को आर्थिक ग्रोथ में गिरावट के कारण पैदा हुए किसी भी बाहरी या अंदरुनी वित्तीय संकट से निपटने में मदद करती है।
  • यह आर्थिक मोर्चे पर संकट के समय देश को आरामदायक स्थिति उपलब्ध कराती है।
  • मौजूदा विदेशी भंडार देश के आयात बिल को एक साल तक संभालने के लिए काफी है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी से रुपए को डॉलर के मुकाबले स्थिति मजबूत करने में मदद मिलती है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार आर्थिक संकट के बाजार को यह भरोसा देता है कि देश बाहरी और घरेलू समस्याओं से निपटने में सक्षम है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की अवस्थिति

  • भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 RBI को विभिन्न विदेशी मुद्रा आस्तियों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • लगभग 64 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार अन्य देशों की प्रतिभूतियों जैसे- ट्रेज़री बिल इत्यादि में रखा जाता है, जिसमें मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिभूतियाँ शामिल हैं।
  • लगभग 28 प्रतिशत विदेशी मुद्रा अन्य केंद्रीय बैंकों में संगृहीत की जाती है और तकरीबन 8 प्रतिशत विदेशी मुद्रा अन्य देशों के वाणिज्यिक बैंकों में भी जमा किया जाता है।

आरबीआई कैसे करता है विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन

  • आरबीआई विदेशी मुद्रा भंडार के कस्टोडियन और मैनेजर के रूप में कार्य करता है। यह कार्य सरकार से साथ मिलकर तैयार किए गए पॉलिसी फ्रेमवर्क के अनुसार होता है।
  • आरबीआई रुपए की स्थिति को सही रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करता है। जब रुपया कमजोर होता है तो आरबीआई डॉलर की बिक्री करता है। जब रुपया मजबूत होता है तब डॉलर की खरीदारी की जाती है। कई बार आरबीआई विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए बाजार से डॉलर की खरीदारी भी करता है।
  • जब आरबीआई डॉलर में बढ़ोतरी करता है तो उतनी राशि के बराबर रुपया जारी करता है। इस अतिरिक्त लिक्विडिटी को आरबीआई बॉन्ड, सिक्योरिटी और एलएएफ ऑपरेशन के जरिए मैनेज करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि के कारण

  • विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि का प्रमुख कारण भारतीय शेयर बाज़ार में पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि होना।
  • विदेशी निवेशकों द्वारा किसी भारतीय कंपनी में भारी भरकम निवेश करना।
  • इसके साथ ही कच्चे तेल की मांग में भारी कमी और उसकी कीमत में गिरावट से विदेशी मुद्रा भंडार में भी बचत हुई।
  • मांग में गिरावट के चलते आयात भी काफी कम हुआ है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार से कम व्यय करना पड़ा है।

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